राजनीति
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव: विकास के दावों के बीच दलित बस्तियों के सवाल
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के बीच विकास के दावों पर सवाल उठ रहे हैं। शहरों की गरीब, दलित और वंचित बस्तियों में पानी, सड़क, सफाई, शौचालय और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। चुनावी वादों के साथ यह भी जरूरी है कि जनप्रतिनिधि पिछले कार्यों और विकास बजट के वास्तविक इस्तेमाल का हिसाब जनता के सामने रखें।
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव: विकास के दावों के बीच दलित बस्तियों के सवाल
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव को लेकर शहरों में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। प्रत्याशी सड़क, नाली, पानी और सफाई जैसी सुविधाओं के विकास के दावे कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन दावों का असर शहरों की गरीब, दलित और वंचित बस्तियों में कितना दिखाई देता है?
राजधानी जयपुर से लेकर छोटे कस्बों तक कई ऐसी बस्तियां हैं, जहां आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जयपुर की जवाहर नगर कच्ची बस्ती में शौचालय और पानी की समस्या बनी हुई है। कई परिवार खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। वहीं, किशनबाग क्षेत्र की राजीव नगर आवास योजना में वर्षों बाद भी बड़ी संख्या में मकान खाली पड़े हैं।
जोधपुर के कालीबेरी स्थित आंबेडकर नगर की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां बड़ी संख्या में दलित समुदाय के खान श्रमिक रहते हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं और मकानों के पट्टों की समस्या अब भी बनी हुई है।
राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए बजट और योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन सवाल इनके जमीनी असर का है। राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को यह बताना चाहिए कि बस्तियों के विकास के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, कितना खर्च हुआ और कौन से काम पूरे हुए।
नगर निकाय चुनाव आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़े होते हैं। इसलिए मतदाताओं को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कौन जीतेगा, बल्कि यह भी सवाल करना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में उनके वार्ड में कितना विकास हुआ और आगे क्या किया जाएगा।
किसी शहर के विकास की असली परीक्षा उसके चौड़े रास्तों और चमकती इमारतों में नहीं, बल्कि उन बस्तियों में होती है जहां लोग आज भी पानी, शौचालय, सड़क, सफाई और रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। नगर निकाय चुनाव में इन सवालों को प्राथमिकता मिलना जरूरी है।
